सरकार खुद ही पहाड़ों में कर रही पहाड़, नदी और प्रकृति का विनाश, लोगों की जान को बढ़ रहा खतरा
देहरादून/चमोली। 7 फरवरी को उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ क्षेत्र के रैणी गांव के पास फटे ग्लेशियर से तमाम सरकारी और निजी निर्माण तबाह हो गये और दर्जनों लोगों की जानें चली गई। बहुतों की लाशें भी नहीं मिलीं। सरकारें और उनके एजेंट इसे प्राकृतिक आपदा बताने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन जानकारों का मानना है कि यह आपदा भारी-भरकम जल विद्यृत परियोजनाओं और अन्य निर्माण कार्यों का प्रतिफल है। अगर ग्लेशियर फटने की घटना प्राकृतिक थी भी तो उससे जो नुक्सान हुआ उसमें बहुत बड़ा कारण सरकारी निर्माण भी हैं। इसके अलावा सरकारी लाइसेंसशुदा और चोरी-सीनाजोरी से भी खनन माफिया रेत, पत्थर आदि भारी मात्रा में पहाड़ से निकाल रहे हैं। तमाम अन्य तरीके के कारोबारी काम पहाड़ में हो रहे हैं जिससे पहाड़ का पूरा तंत्र और क्षेत्र प्रभावित हो रहा है। उत्तराखंड में हर तरफ पहाड़ काटकर सड़कें बन रही हैं। पोकलैंड और जेसीबी जैसी भीमकाय मशीनों और पहाड़ काटने के लिए डायनामाइट का शोर देवभूमि की शांति भंग कर रहा है। कंस्ट्रक्शन कंपनियां ढलानों और प्राकृतिक नदियों में मलबा डंप कर रही हैं। मलबों का यह ढेर नदियों के प्रवाह को रोक रहा है।...