सत्ता के शिखरों पर अपराधी काबिज, बिना कारण बताए यूपी ने वापस लिए गंभीर आपराधिक मुकदमे
नई दिल्ली। केंद्र से लेकर राज्यों तक के मंत्री मंडलों में गंभीर अपराधों में मुकदमों का सामना कर रहे राजनीतिक शामिल हैं। सांसद, विधायक और दूसरे जनप्रतिनिधि गंभीर अपराधों में आरोपी हैं। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तमाम कोशिशों के बावजूद इनके मुकदमे लंबित रहते हैं। और नये अपराधी चुनाव जीतकर सत्ता, राजनीति में आ जाते हैं। उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने तक गंभीर आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे थे। लेकिन राज्य के सत्ता शीर्ष पर काबिज होते ही उन्होंने खुद पर लगे मुकदमे वापस करवा दिए। उन्होंने मुमुक्षु आश्रम, शाहजहांपुर के मुखिया और अटल बिहारी वाजपेयी में राज्यमंत्री रहे चिन्मयानंद पर लगा बलात्कार का मुकदमा वापस ले लिया। चिन्मयानंद पर उनकी एक शिष्या चिदर्पिता ने हरिद्वार में यौन शोषण करने का मुकदमा दर्ज कराया था। चिन्मयानंद पर उनके लाॅ कालेज की एक छात्रा ने भी बलात्कार का आरोप लगाया इसमें भी योगी आदित्यनाथ ने उन्हें बचाने का भरपूर प्रयास किया। कई मामलों में योगी ने भाजपा या खुद के सहयोगियों को बचाने का प्रयास किया। सुप्रीम कोर्ट को मंगलवार को सूचित किया गया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के संबंध में सीआरपीसी की धारा 321 के तहत 77 मामले बिना कोई कारण बताए वापस ले लिए हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने 2016 में अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर एक याचिका में न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया, जिसमें मौजूदा और पूर्व सांसदोंध् विधायकों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे में तेजी लाने के निर्देश की मांग की गई थी, ने शीर्ष अदालत में एक रिपोर्ट दायर की है। इस मामले में अधिवक्ता स्नेहा कलिता ने उनकी मदद की है। मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना की अध्यक्षता वाली पीठ याचिका पर विचार करने वाली है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकार ने न्यायमित्र को सूचित किया है कि 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों से संबंधित 510 मामले मेरठ क्षेत्र के पांच जिलों में 6,869 आरोपियों के खिलाफ दर्ज किए गए थे। इनमें से 175 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किया गया, 165 मामलों में अंतिम रिपोर्ट पेश की गई और 170 मामलों को हटा दिया गया। रिपोर्ट में कहा गया है, इसके बाद राज्य सरकार द्वारा सीआरपीसी की धारा 321 के तहत 77 मामले वापस ले लिए गए। सरकारी आदेश सीआरपीसी की धारा 321 के तहत मामले को वापस लेने का कोई कारण नहीं बताते हैं। इसमें केवल यह कहा गया है कि प्रशासन ने पूरी तरह से विचार करने के बाद निर्णय लिया है।
न्यायमित्र ने प्रस्तुत किया कि केरल राज्य बनाम के.अजीत 2021 के मामले में शीर्ष अदालत द्वारा निर्धारित कानून के आलोक में, सीआरपीसी की धारा 401 के तहत पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करके उच्च न्यायालय द्वारा 77 मामलों की जांच की जा सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कर्नाटक सरकार ने 31 अगस्त, 2020 को 62 मामलों को वापस लेने की अनुमति देने का आदेश पारित किया। आदेश में केवल यह कहा गया है कि सरकार ने बिना कोई कारण बताए निकासी की अनुमति दी है। न्यायमित्र ने राजनीतिक और बाहरी कारणों से अभियोजन वापस लेने में राज्य द्वारा सत्ता के बार-बार दुरुपयोग को देखते हुए निर्देश दिए जाने का सुझाव दिया।
रिपोर्ट में कहा गया है, उपयुक्त सरकार लोक अभियोजक को निर्देश तभी जारी कर सकती है, जब किसी मामले में सरकार की राय हो कि अभियोजन दुर्भावनापूर्ण तरीके से शुरू किया गया था और आरोपी पर मुकदमा चलाने का कोई आधार नहीं है। इसमें आगे कहा गया है कि ऐसा आदेश संबंधित राज्य के गृह सचिव द्वारा प्रत्येक व्यक्तिगत मामले के लिए दर्ज किए जाने वाले कारणों के लिए पारित किया जा सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है, इस माननीय न्यायालय के 16 सितंबर, 2020 के आदेश के बाद धारा 321 सीआरपीसी के तहत वापस लिए गए सभी मामलों की संबंधित उच्च न्यायालयों द्वारा धारा 401 सीआरपीसी के तहत पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करके जांच की जा सकती है।
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