किरकिरी के बाद सुप्रीम सफाई, बलात्कारी को पीड़िता से शादी करने को नहीं कहा, मुख्य न्यायाधीश बोबड़े ने उच्चतम न्यायालय की गरिमा सर्वाधिक गिराई, हो रही माफी मांगने और इस्तीफे की मांग
नई दिल्ली। मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सोमवार को कहा कि आरोपी को रेप पीड़िता से शादी करने संबंधी कथित सुझाव को लेकर मीडिया में जो खबरें आईं, या सामाजिक कार्यकर्ताओं के जो बयान सामने आए, वे सभी संदर्भ से परे हैं। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि यह हमेशा महिलाओं को सर्वाधिक सम्मान और आदर देता है। बोबडे की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ में जस्टिस ए.एस. बोपन्ना और जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यन भी शामिल हैं। पीठ ने कहा कि कोर्ट ने मामले के संदर्भ में आरोपी से केवल यह पूछा था कि क्या वह शिकायतकर्ता (पीड़िता) से शादी करेगा। कोर्ट ने उससे यह कभी भी नहीं कहा कि आप जाइए और उससे शादी कर लीजिए।
मुख्य न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि मामले में अदालत की कार्यवाही को पूरी तरह से गलत रूप में पेश किया गया।
गौरतलब है कि पीठ ने 14-वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता द्वारा दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की थी। पीड़िता ने अधिवक्ता वी.के. बीजू के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और 26 माह के गर्भ को गिराने का अनुरोध किया था। पिछले हफ्ते, नाबालिग से दुष्कर्म के आरोपी 23-वर्षीय शख्स की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान पीठ ने आरोपी से पूछा था, क्या तुम उससे शादी करोगे? शादी करने के वादे से मुकरने के बाद लड़की ने आरोपी के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज कराई थी। 5 फरवरी को, बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करते हुए लड़की के आवेदन की अनुमति दी।
हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सोमवार को अधिवक्ता वी.के. बीजू ने कहा कि वह पूरी तरह से उन रिपोटरें के खिलाफ हैं, जिसने अदालत की छवि को धूमिल किया। पीठ ने कहा कि अदालत महिलाओं को सबसे अधिक सम्मान देती है और यहां तक कि सुनवाई में कभी भी आरोपी को पीड़िता से शादी करने का सुझाव नहीं दिया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के अनुसार अदालत को तथ्यों की खोज के लिए या किसी भी उद्देश्य के लिए कोई भी प्रश्न पूछना अनिवार्य है। मेहता ने कहा कि अदालत के बयानों को संदर्भ से बाहर कर दिया गया और समाज के एक वर्ग ने गलत तरीके से अदालत और न्यायाधीशों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, हमारे पास महिलाओं के लिए सर्वोच्च सम्मान है। हमारी प्रतिष्ठा बार के हाथों में है। सुप्रीम कोर्ट गर्भपात करवाने की याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई जारी रखेगी।
मालूम हो कि बलात्कारी सरकारी कर्मचारी है। खबरों में बोबड़े की ओर से कहा गया था कि अगर वह शादी नहीं करता है तो कानूनी कार्रवाई होने पर उसकी नौकरी जा सकती है। यह मामला काफी तूल पकड़ गया था। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि पीड़िता को न्याय देने और आरोपी पर अपराध बनता है या नहीं यह तय करने के बजाय सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कारी को राहत देने का प्रयास किया। इसे लेकर देश-दुनिया में मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबड़े की काफी आलोचना हुई है और 400 महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक खुली चिट्ठी लिखकर बोबड़े से इस्तीफा देने की मांग की है। यह शायद पहला ऐसा मामला है जब मुख्य न्यायाधीश का इस्तीफा मांगा गया हो। बोबड़े के समय में सुप्रीम कोर्ट की साख सबसे ज्यादा खराब हुई है। प्रशांत भूषण का मामला, अर्नव गोस्वामी को जमानत, तमाम जेलों में बंद पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की याचिका न सुनने, धारा 370 बाद जम्मू-कश्मीर से आई तमाम याचिकाओं पर ध्यान न देने इत्यादि ऐसे तमाम मामले हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने पर्याप्त लापरवाही दिखाई है। हाल ही में पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट का दोहरा रवैया देखने को मिला है। उन्होंने इंडिया टुडे काॅन्कलेव में न्यायपालिका पर गंभीर टिप्पणियां की हैं, ऐसी बातें कोई और करता तो वह सुप्रीम कोर्ट की ओर से भारी मुसीबत में पड़ जाता लेकिन गोगोई पर जब अदालत की अवमानना का केस दर्ज करने का मामला आया तो सुप्रीम कोर्ट ने मामला चलाने से इनकार कर दिया।
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