अनुसूचित जाति, जनजाति की छात्राओं का प्रोत्साहन बजट सरकार ने 99.1 प्रतिशत घटाया SC and ST School Going Girl

नई दिल्ली। मोदी सरकार के दौर में शिक्षा काफी बदहाल हुई है। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के विद्यालयों की हालत खस्ता हुई है तो महाविद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर अपनी संकीर्ण राजनीति के चलते भारी बर्बादी हुई है। शिक्षा के बजट में कटौती हुई है। कहां तो बच्चों को प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक बेहतरी आनी चाहिए थी लेकिन सबसे ज्यादा बदहाल शिक्षा ही हुई है। केंद्रीय बजट में मोदी सरकार ने माध्यमिक शिक्षा की राष्ट्रीय प्रोत्साहन योजना के बजट को इस बार 99.1 घटा दिया है। इस योजना के तहत 8वीं पास करने वाली अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की छात्राओं को स्कॉलरशिप दी जाती थी, ताकि वो पढ़ाई न छोड़ें। सरकारी आंकड़े के अनुसार, हर साल 8वीं में पढ़ने वाली तीन लाख से ज्यादा छात्राओं को 9वीं की पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। सरकार ने 2017-18 में जब इस योजना का बजट बढ़ाया था, तब पढ़ाई छोड़ने वाली छात्राओं में एक तिहाई की भारी कमी आई थी। साल 2020 में जब कोरोना महामारी के वक्त एससी, एसटी बच्चियों की पढ़ाई अधिक खतरे में है, तब सरकार ने इसका बजट घटा दिया है। राइट टू एजुकेशन फोरम के अनुसार, देश में 11 से 14 साल की 16 लाख लड़कियां स्कूल नहीं जातीं। इनमें एससी, एसटी की माध्यमिक शिक्षा के लिए जाने वाली छात्राओं की हालत सबसे खराब है। इस वक्त 6वीं से 10वीं कक्षा तक देश में कुल छात्राओं में एससी, एसटी बच्चियों की भागीदारी महज 13.6 प्रतिशत है। इनमें 18.6 प्रतिशत एससी और 8.6 प्रतिशत एसटी हैं। जनसंख्या में एससी, एसटी की भागीदारी 28 प्रतिशत से ज्यादा है। यानी आज भी 50 प्रतिशत से ज्यादा एससी, एसटी बच्चियां 9वीं कक्षा तक नहीं पहुंच पातीं। विद्यालय जाने वाली बच्चियों की संख्या कम न हो, इसी उद्देश्य के साथ 2008 में यह प्रोत्साहन योजना शुरू हुई थी। सन् 2008 में सरकार ने प्रोत्साहन योजना के लिए 20 लाख रुपए का बजट रखा था, लेकिन इस साल जब 9वीं में एडमिशन हुए तो सरकार के अनुमान से कई गुना ज्यादा एससी, एसटी छात्राओं ने स्कूल में नाम लिखवाया। सरकार को बजट बढ़ाकर 24.20 करोड़ रुपए करना पड़ा। सरकार ने 2019-20 में योजना का बजट 100 करोड़ रुपए रखा, लेकिन खर्च 8.57 करोड़ रुपए कर पाई। अगले साल यानी 2020-21 में 110 करोड़ का बजट घोषित तो किया, लेकिन खर्च एक करोड़ ही हुए। इस योजना के लिए 2021-22 का अनुमानित बजट एक करोड़ है। इस साल कितनी एससी, एसटी छात्राएं 9वीं में जाएंगी, इसका पुख्ता आंकड़ा मौजूद नहीं है, लेकिन 2019 तक हर साल करीब 27 लाख एससी, एसटी छात्राएं 9वीं में प्रवेश ले रही थीं। अगर योजना के तहत हर छात्रा को तीन हजार की स्कॉलरशिप दी जाए तो भी 800 करोड़ रुपए से ज्यादा का बजट चाहिए होगा। इस योजना से कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में पढ़ने वाली छात्राओं को भी लाभ होता है। 31 मार्च 2020 तक देश में 625 कस्तूरबा विद्यालय थे, जिनमें 65 हजार 249 छात्राएं थीं। इनमें एससी, एसटी छात्राओं के अलावा अन्य वर्ग की छात्राएं कम पढ़ती हैं। राइट टू एजुकेशन फोरम में डॉक्यूमेंटेशन कॉर्डिनेटर मित्र रंजन कहते हैं, माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर लड़कियों के ड्रॉपआउट होने का आंकड़ा सबसे ज्यादा होता है। अगर इस स्तर पर पढ़ाई छूटे तो उनका फिर से स्कूली शिक्षा पूरी कर पाना बहुत मुश्किल होता है। यही वजह थी कि अनुसूचित जाति, जनजाति की छात्राओं के लिए मैट्रिक पूर्व छात्रवृत्ति योजना की जरूरत थी। 2016 के एक आंकड़े के अनुसार, देश में 11 से 17 साल तक की कुल अनुसूचित जाति, जनजाति लड़कियों की आबादी 2 करोड़ 90 लाख थी। उनमें 6वीं से लेकर 10वीं तक कुल 1 करोड़ 43 लाख पढ़ रही थीं। यानी 50 प्रतिशत से ज्यादा लड़कियां माध्यमिक शिक्षा के लिए स्कूलों में नहीं थीं। 2017-18 में जब सरकार ने योजना का बजट 711 प्रतिशत बढ़ाया था, तब 9वीं ही नहीं इसका असर छठी कक्षा से लेकर 10वीं तक नजर आया था। ज्ञातव्य है कि पिछले साल संसदीय समिति ने इस पर चिंता जताई थी और एजुकेशन डिपार्टमेंट से एससीएसटी समुदाय के छात्र-छात्राओं के पढ़ाई छोड़ने की वजहों का सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक वजहों का अध्ययन करने को भी कहा था। उन्होंने माध्यमिक स्तर पर बढ़ते ड्रॉपआउट पर जोर देते हुए इसे रोकने की रणनीतियों और बढ़ते ड्रॉपआउट की वजहों को खत्म करने को कहा था। केंद्रीय बजट 2020-21 में एससीएसटी की छात्राओं के लिए 750 एकलव्य आवासीय स्कूल खोलने का लक्ष्य रखा गया है। एक स्कूल खोलने का बजट 20 करोड़ से बढ़ाकर 38 करोड़ रुपए कर दिया गया है। अगर स्कूल पहाड़ी इलाके में खुलता है, तो बजट 48 करोड़ होगा। अभी तक 566 एकलव्य स्कूल खोलने की अनुमति मिल चुकी है। इनमें से 285 ही चल रहे स्कूलों में 73,391 स्टूडेंट पढ़ रहे हैं। इसके साथ अनुसूचित जाति के स्टूडेंट्स को दी जाने वाली पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप स्कीम पर 2025-26 तक 35,219 करोड़ रुपए खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार का कहना है कि इस बजट में बढ़ोतरी की गई है। जबकि मित्र रंजन कहते हैं, सरकार रिवाइज्ड बजट से बढ़ोतरी की बात कर रही है। पिछले आवंटन से इसमें कमी आई है। इसके अलावा जब माध्यमिक स्तर पर ही बच्चियों की पढ़ाई छूट जाएगी तो उच्चतर स्तर पर स्कॉलरशिप का बजट बढ़ाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वहीं एससीएसटी छात्राओं को दी जाने वाली इस स्कॉलरशिप में कई सालों तक बढ़ोतरी के बाद तेजी से कमी की गई। संसदीय समिति ने इस पर चिंता जताते हुए कहा था कि यह स्कॉलरशिप हाशिए पर जी रहे समुदाय के स्टूडेंट्स के लिए बहुत ही जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा था कि फिलहाल एससीएसटी समुदाय से आने वाले हर पांच में से एक स्टूडेंट को माध्यमिक शिक्षा के दौरान पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। यानी 100 में से 20 को स्कूल छोड़ना पड़ता है। मालूम हो कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जेंडर इंक्लूजन फंड बनाने की बात भी कही गई, लेकिन बजट कुछ और ही बयां कर रहा है। शिक्षा बजट में 6 हजार करोड़ रुपए की कटौती की गई है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे फ्लैगशिप प्रोग्राम तक किसी अन्य योजना के साथ मिला दिए गए हैं। इससे लड़कियों की शिक्षा पर बहुत बुरा असर होना है। जय हिंद ! जय संविधान ! जय किसान ! जय जनता ! भारत की मेहनतकश जनता जिंदाबाद ! गूगल में देखिए हमारे ब्लाॅग्स और अपनी बात कहिए: https://india2020newview.blogspot.com https://gangaprawah.blogspot.com अपने सुझाव, समाचार, रचनाएं ब्लाॅग्स हेतु भेजिए और पत्रकार बनने के लिए अपना बायोडाटा भेजिए ईमेल nirnaylok@gmail.com और indianewview@gmail.com पर।

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