कोरोना से जीते मगर मौत से हार गये उर्दू शायर पद्म श्री शम्सुर रहमान फारूकी, अपने पुश्तैनी घर में जाने के आधे घंटे बाद गुजर गये
नई दिल्ली/इलाहाबाद। प्रख्यात उर्दू शायर शम्सुर रहमान फारूकी का शुक्रवार को इलाहाबाद में निधन हो गया। 85 साल के फारूकी एक महीने पहले ही कोरोना से रिकवर हुए थे। पद्म श्री से सम्मानित फारूकी को 23 नवंबर को दिल्ली के एक अस्पताल से छुट्टी मिली थी। कोरोना संक्रमित होने के बाद उन्हें हाॅस्पीटल में एडमिट किया गया था। उनके भतीजे महमूद फारूकी ने बताया कि दिल्ली में रहते हुए उन्होंने अपने घर इलाहाबाद जाने की जिद की। हम उन्हें लेकर सुबह यहां पहुंचे। घर आने के आधे घंटे बाद ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।
मालूम हो कि 30 सितंबर 1935 को जन्मे शम्सुर रहमान फारूकी को दास्तानगोई को दोबारा जिंदा करने का श्रेय हासिल है। दास्तानगोई 16वीं शताब्दी में उर्दू स्टोरी टेलिंग का एक रूप है। 50 साल तक वे उर्दू में रचनाएं लिखते रहे। इनमें 1989 में लिखी गालिब अफसाने की हिमायत में, 2006 में आई मिरर ऑफ ब्यूटी (कई चांद थे सर-ए-आसमान) और 2014 में लिखी गई द सन रोज फ्रॉम द अर्थ खास हैं। 1996 में उन्हें सरस्वती सम्मान भी मिला था।
मशहूर उर्दू साहित्यकार शम्सुर रहमान फारुकी उर्दू जबान व अदब के नामवर आलोचक हैं। उनको उर्दू आलोचना के टी.एस.एलियट के रूप में माना जाता है और उन्होंने साहित्यिक समीक्षा के नए मॉडल तैयार किए। इनके द्वारा रचित एक समालोचना तनकीदी अफकार के लिये उन्हें सन् 1986 में साहित्य अकादमी पुरस्कार (उर्दू) से सम्मानित किया गया। मालूम हो कि शम्सुर रहमान का जन्म 15 जनवरी 1935 को हुआ था। उन्होंने अंग्रेजी में (एमए) की डिग्री 1955 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की। उनके माता-पिता अलग - अलग पृष्ठभूमि के थे, पिता देवबंदी मुसलमान थे जबकि मां का घर काफी उदार था। उनकी परवरिश उदार वातावरण में हुई, वह मुहर्रम और शबे बारात के साथ होली भी मनाया करते थे।

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