कविता- नागार्जुन .. मोटे सलाखों वाली काली दीवार के उस पार.. क्रान्ति सुगबुगाई है indian hindi poetry and hindi literature



क्रान्ति सुगबुगाई है

करवट बदली है क्रान्ति ने

मगर वह अभी भी उसी तरह लेटी है

एक बार इस ओर देखकर

उसने फिर से फेर लिया है

अपना मुँह उसी ओर

’सम्पूर्ण क्रान्ति’ और ’समग्र विप्लव’ के मंजु घोष

उसके कानों के अन्दर

खीज भर रहे हैं या गुदगुदी

यह आज नहीं, कल बतला सकूँगा !

अभी तो देख रहा हूँ

लेटी हुई क्रान्ति की स्पन्दनशील पीठ

अभी तो इस पर रेंग रहे हैं चींटें

वे भली-भाँति आश्वस्त हैं

इस उथल-पुथल में

एक भी हाथ उन पर नहीं उठेगा

चलता रहा उनका धन्धा

वे अच्छी तरह आश्वस्त हैं

वे क्रान्ति की पीठ पर मज़े में टहल-बूल रहे हैं

क्रान्ति सुगबुगाई थी ज़रूर

लेकिन करवट बदल कर

उसने फिर उसी दीवार की ओर

मुँह फेर लिया है

मोटे सलाखों वाली काली दीवार की ओर !

मोटे सलाखों वाली काली दीवार के उस पार

न सुसज्जित मंच है, न फूलों का ढेर

न बन्दनवार, न मालाएँ

न जय-जयकार

न करेंसी नोटॊं की गड्डियों के उपहार

मोटे सलाखों वाली काली दीवार के उस पार

नारकीय यन्त्रणा देकर

तथाकथित ’अभियोग’ कबूल करवाने वाले

एलैक्ट्रिक कण्डक्टर हैं

मोटे सलाखों वाली काली दीवार के उस पार

लट्ठधारी साधारण पुलिसमैन नहीं हैं

वहाँ तो मुस्तैद है अपनी ड्यूटी में

डी० आई० जी० रैंक का घुटा हुआ अधेड़ बर्बर

कमीनी निगाहों — तिहरी मुस्कानों वाला

मोटे होठों में मोटा सिगार दबाए हुए

वो अब तक कर चुका है

जाने, कितने तरुणों का नितम्ब-भंजन

जाने कितनी तरुणियों के भगाँकुर

करवा दिए हैं सुन्न

डलवा-डलवा कर बिजली के सिरिंज

मोटे सलाखों वाली काली दीवार के उस पार

शिष्ट सम्भ्रान्त आई० ए० एस० ऑफ़िसर नहीं है

वहाँ तो हिटलर का नाती है

तोजो का पोता है

मुसोलिनी का भांजा है

दीवार की इस ओर के

कोमल कण्ठों से निकले नरम-गरम नारे

वहाँ तक नहीं पहुँच पाते हैं

पहुँच भी पाएँ तो बर्बर हत्यारा

अपने कानों के अन्दर गुदगुदी ही महसूस करेगा

उसे बार-बार हंसी छूटेगी

सरलमति बालकों की खानदानी नादानी पर

[गत् वर्ष उस बर्बर डी० आई० जी० की साली भी बैठ गई थी

बारह घण्टों वाले प्रतीक अनशन पर, चौराहे के सामने

रिक्शा वालों ने कहा था : "हाय, राम !

सोने की चूड़ियाँ भी इस तमाशे में शामिल हैं !"

 मोटे सलाखों वाली काली दीवार के उस पार

अविराम चालू हैं यन्त्रणाएँ

अग्निस्नान और अग्निदीक्षा की

वहाँ क्रान्ति और विप्लव

तरुण शान्ति सेना वालों के

सुगन्धित कर्मकाण्ड नहीं हुआ करते !

मोटे सलाखों वाली काली दीवार के उस पार

काम नहीं आएँगे शिथिल संकल्प

तरल भावाकुलता

शीतोष्ण उद्‍वेलन

वाक्य-विन्यास का कौशल

गणित की निपुणता

कुलीनता के नखरे

मोटे सलाखों वाली काली दीवार के उस पार

कोई गुंजाइश नहीं होगी

उत्पीड़न की छायाछवियाँ उतारने की

क्रान्ति और विप्लव का फिल्मीकरण

कहीं और होता होगा

बार-बार लाखों की भीड़ जुटी

बार-बार सुरीले कण्ठों से लहराई

"जाग उठी तरुणाई... जाग उठी तरुणाई"

बार-बार खचाखच भरा गाँधी मैदान

बार-बार प्रदर्शन में आए लाखों लाख जवान

बार-बार वापस गए

बार-बार आए

बार-बार आए

बार-बार वापस गए

हवा में भर उठी इंक़लाब के कपूर की ख़ुशबू

बार-बार गूँजा आसमान

बार-बार उमड़ आए नौजवान

बार-बार लौट गए नौजवान.


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