समाज की कड़वी सच्चाइयों का अनावरण करते मंटों झूठों और अनैतिकों को नापसंद उस सभ्यता, समाज और संस्कृति की चोली क्या उतारुंगा जो है ही नंगी .. सआदत हसन मंटो



उर्दू के बेहद मशहूर अफसानानिगार सआदत हसन ‘मंटो’ ने अपने समय के समाज और व्यवस्था की सच्चाइयों का अनावरण अपनी कहानियांे में किया। हमारी व्यवस्था और समाज के लोग दोहरी स्थितियों में जीते हैं, वे जिस रूप में समाज के सामने अपने को पेश करते हैं अपनी वास्तविक सोच से वे उससे काफी भिन्न होते हैं। इसलिए सच को वे बर्दाश्त नहीं कर पाते। सच्चाइपसंद मंटो इसलिए न तो अपने समय में और न ही आज के समय में बहुत लोगों को पसंद हैं।

मंटो को करोड़ों-करोड़ लोग दिल की गहराइयों से चाहते हैं। लेकिन एक छोटा तबका मंटो को पसंद नहीं करता। आपने राजकपूर की फिल्म देखी होगी, जागते रहो। उसमें भद्रजनों के घरों की असलियत उजागर करने का लघु प्रयास किया गया है। मंटो ने समाज की हकीकत अपने साहित्य में उजागर की है। और सच्चाई लोगों को पसंद नहीं है। हम सब दोगलेपन का शिकार हैं, हम आमतौर पर भीतर से अनैतिक हैं लेकिन बाहर से संत - पुण्यात्मा दिखाने का प्रयास करते हैं। जब कोई इसको उघाड़ने की कोशिश करता है तो हमें बड़ी चोट पहुंचती है, हम तिलमिला जाते हैं। सआदत हसन मंटो बड़ा और महान लेखक होकर भी एक ‘बदनाम’ लेखक हुआ. समझा गया कि मंटो को उनकी कहानियों ने ही एक बदनाम लेखक का खिताब दिया.

उनकी बदनाम कहानियों पर बहुत कुछ लिखा-पढ़ा गया. बार-बार उनकी उन पांच कहानियों धुंआ, बू, ठंडा गोश्त, काली सलवार और ऊपर, नीचे और दरमियां का जिक्र किया गया जिसकी वजह से उनपर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाकर मुकदमा चलाया गया.

इनमें से चार मुकदमें अंग्रेजों के शासन काल में हुए तो एक मुकदमा देश के बंटवारे के बाद के पाकिस्तान में हुआ. लेकिन जरा सोचिए कि अगर मंटो बदनाम लेखक न होते तो फिर उर्दू के एक आम अफसानानिगार ही तो होते.

उन्होंने शोहरत की तरह ही बदनामी कमाई थी और यही उनकी रचनात्मक विलक्षणता की वास्तविक कमाई थी. उन्होंने इंसानी मनोविज्ञान का जैसा नंगा चित्रण अपनी कहानियों में बयां किया अगर वो बदनाम न होते तो यह उनकी नाकामयाबी मानी जाती.

उनकी कहानियों में मानो लगता है कि सभ्यता और इंसान की बिल्कुल पाश्विक प्रवृत्तियों के बीच जो द्वंद है, उसे उघाड़कर रख दिया गया है. सभ्यता का नकाब ओढ़े इंसानी समाज को चुनौती देती उनकी कहानियां बहुत वाजिब थी कि उसके लेखक को कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगवाए.

लेकिन दिलचस्प है कि किसी भी मामले में मंटो को सजा नहीं हुई. सिर्फ एक मामले में पाकिस्तान की अदालत ने उन पर जुर्माना लगाया था. इसे भी एक विडंबना ही कहिए कि मंटो सभ्यता और संस्कृति के ठेकेदारों की नजर में जहां एक तरफ समाज के मुजरिम थे तो वही इसी सभ्य समाज की बनाई गई अदालतों में वो सिर्फ समाज की नंगी सच्चाइयों पर लिखने वाले एक कहानीकार थे.

मंटो अपने वक्त के खोखलेपन और विसंगतियों को बखूबी पहचानते थे. तभी तो वो कहते थे, ‘मुझमें जो बुराइयां हैं दरअसल वो इस युग की बुराइयां हैं. मेरे लिखने में कोई कमी नहीं. जिस कमी को मेरी कमी बताया जाता है वह मौजूदा व्यवस्था की कमी है. मैं हंगामापसंद नहीं हूं. मैं उस सभ्यता, समाज और संस्कृति की चोली क्या उतारुंगा जो है ही नंगी.

अक्सर लोग कहा करते हैं कि मंटो अपने वक्त से आगे के लेखक थे लेकिन सच पूछिए तो मंटो बिल्कुल अपने वक्त के ही कहानीकार थे. उनकी अहमियत को बस वाजिब तरीके से पहचाना और मान देना शुरू किया गया है पिछले एक दशक में.

यह उस वक्त की परेशानी थी जहां मंटो को समझा नहीं जा रहा था या फिर समझने की कोशिश नहीं की जा रही थी. लेकिन यह भी सच है कि उन्हें कभी नजरअंदाज भी नहीं किया जा सका.

इसकी वजह है उनकी कहानी के वो विषय जो उस दौर में मौंजू तो थे लेकिन अब आकर कहीं ज्यादा प्रासंगिक लगने लगे हैं. औरत-मर्द के रिश्ते, दंगे और भारत-पाकिस्तान का बंटवारा जैसे मसले एक अलग ही अंदाज में उनकी कहानियों में मौजूद होते थे. उनकी कहानियों की वो औरतें जो उस वक्त भले कितनी ही अजीब लगे लेकिन वे वैसी ही थी जैसी एक औरत सिर्फ एक इंसान के तौर पर हो सकती है. मौजूदा दौर में जब अब स्त्रीवादी लेखन और विचार के कई नए आयाम सामने आ रहे हैं तब मंटो की उन औरतों की खूब याद आ रही है और इसी बहाने मंटो की भी. लेकिन इसके बावजूद मंटो की औरतों को किसी खांचे में फिट करना मुश्किल होगा.

अपनी कहानी की औरतों के बारे में खुद मंटो कहते हैं, ‘मेरे पड़ोस में अगर कोई महिला हर दिन अपने पति से मार खाती है और फिर उसके जूते साफ करती है तो मेरे दिल में उसके लिए जरा भी हमदर्दी पैदा नहीं होती. लेकिन जब मेरे पड़ोस में कोई महिला अपने पति से लड़कर और आत्महत्या की धमकी दे कर सिनेमा देखने चली जाती है और पति को दो घंटे परेशानी में देखता हूं तो मुझे हमदर्दी होती है.’मंटो जिस बारीकी के साथ औरत-मर्द के रिश्ते के मनोविज्ञान को समझते थे उससे लगता था कि उनके अंदर एक मर्द के साथ एक औरत भी जिंदा है. उनकी कहानियां जुगुप्साएं पैदा करती हैं और अंत में एक करारा तमाचा मारती है और फिर आप पानी-पानी हो जाते हैं.

उनकी एक कहानी है ‘मोजील’. यह एक यहूदी औरत (मोजील) की कहानी है. उसके पड़ोस में रहने वाले एक सिख आदमी त्रिलोचन को उससे मोहब्बत हो जाती है. वो उससे शादी करना चाहता है लेकिन वो यहूदी औरत उससे शादी नहीं करती. उसे लगता है कि वो सिख उसके हिसाब से खुले मिजाज का नहीं और मजहबी है.

उस सिख को एक दूसरी लड़की अपनी ही बिरादरी की मिल जाती है और वो उससे सगाई कर लेता है. तभी दंगा भड़कता है और उसकी मंगेतर दंगे में फंस जाती है. जिस मोहल्ले में वो रह रही होती है वहां दंगे के बाद कर्फ्यू लगा दिया गया है. मोजील उसे लेकर उसकी मंगेतर को बचाने उस मोहल्ले में जाती है. वो अपना गाउन उसके मंगेतर को पहना देती है ताकि उसकी मंगेतर एक यहूदी जान पड़े और उन दोनों को वहां से भागने को कहती है.

वो खुद दंगाइयों की भीड़ के सामने बिना कपड़ों के नंगे आ जाती है ताकि दंगाइयों का ध्यान उसकी तरफ हो जाए. तभी वो सीढ़ियों से गिर जाती है और लहूलुहान हो जाती है. सरदार अपनी पगड़ी से उसके नंगे जिस्म को ढकने की कोशिश करता है लेकिन मोजील उसकी पगड़ी को फेंकते हुए कहती है कि ‘ले जाओ इस को३अपने इस मजहब को.’

सआदत हसन मंटो की रचना यात्रा उनकी कहानियों की तरह ही बड़ी ही विचित्रता से भरी हुई है. एक कहानीकार जो जालियांवाला बाग कांड से उद्वेलित होकर पहली बार अपनी कहानी लिखने बैठता है वो औरत-मर्द के रिश्तों की उन परतों को उघाड़ने लगता है जहां से पूरा समाज ही नंगा दिखने लगता है.

मंटो ने ताउम्र मजहबी कट्टरता के खिलाफ लिखा, मजहबी दंगे की वीभत्सता को अपनी कहानियों में यूं पेश किया कि आप सन्न रह जाए. उनके लिए मजहब से ज्यादा कीमत इंसानियत की थी.मंटो ने लिखा, ‘मत कहिए कि हजारों हिंदू मारे गए या फिर हजारों मुसलमान मारे गए. सिर्फ ये कहिए कि हजारों इंसान मारे गए और ये भी इतनी बड़ी त्रासदी नहीं है कि हजारों लोग मारे गए. सबसे बड़ी त्रासदी तो ये है कि हजारों लोग बेवजह मारे गए.

हजार हिंदुओं को मारकर मुसलमान समझते हैं कि हिंदू धर्म खघ्त्म हो गया लेकिन ये अभी भी जिंदा है और आगे भी रहेगा. उसी तरह हजार मुसलमानों को मारकर हिंदू इस बात का जश्न मनाते हैं कि इस्लाम खघ्त्म हो चुका. लेकिन सच्चाई आपके सामने है. सिर्फ मूर्ख ही ये सोच सकते हैं कि मजहब को बंदूक से मार गिराया जा सकता है.

बिल्कुल अपनी कहानियों की औरतों की तरह ही मंटो को भी किसी खांचे में फिट करना एक बेहद मुश्किल काम है. उस वक्त कृश्न चंदर, राजिन्दर सिंह बेदी, अहमद नदीम कासमी, इस्मत चुगताई और ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे लेखकों के होते हुए भी मंटो तो अकेला ही था.

बंटवारे का दर्द हमेशा उन्हें सालता रहा. 1948 में पाकिस्तान जाने के बाद वो वहां सिर्फ सात साल ही जी सके और 1912 में भारत के पूर्वी पंजाब के समराला में पैदा हुए मंटो 1955 में पाकिस्तान के पश्चिमी पंजाब के लाहौर में दफन हो गए.

कैसी विडंबना है कि मंटो के जाने के इतने सालों बाद जिंदगी भर कोर्ट के चक्कर लगाने वाला, मुफलिसी में जीने वाला, समाज की नफरत झेलने वाला मंटो आज खूब चर्चा में है. उन पर फिल्में बन रही हैं. उनके लेखों को खंगाला जा रहा है. अभी कुछ सालों पहले ही मंटो के लेखों का एक संग्रह ‘व्हाई आई राइट’ नाम से अंग्रेजी में अनुवाद कर निकाला गया है. लेकिन मंटो अपनी किताब गंजे फरिश्ते  में लिखते हैं कि मैं ऐसे समाज पर हजार लानत भेजता हूं जहां यह उसूल हो कि मरने के बाद हर शख्स के किरदार को लॉन्ड्री में भेज दिया जाए जहां से वो धुल-धुलाकर आए.


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